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सुरकंडा देवी दर्शन

प्रिय मित्रों,

यदि आप मेरी इस सोलो घुमक्कड़ी के प्रारंभ से ही मेरे साथ – साथ हैं तो आप जानते ही हैं कि मैं दि. 28 March 2021 को, यानि होलिका दहन वाले दिन सुबह गुड़गांव से चल कर ऋषिकेश – नरेन्द्र नगर – चंबा होते हुए कानाताल आ पहुंचा था और यहां पर Stay in Camp Kanatal में ठहरा हुआ हूं जो जड़ीपानी गांव में है। आज मेरी यात्रा का दूसरा दिन है और सुबह से मैने अब तक क्या – क्या किया है, कहां – कहां घूमा हूं ये आप इस भाग में पढ़ सकते हैं!

अगर आप इस यात्रा का विवरण शुरु से पढ़ना चाहें तो पहला भाग ये रहा !

कानाताल के बारे में विस्तृत जानकारी यहां उपलब्ध है !

29 March 2021 : 1.30 P.M.

सुबह से पहाड़ी रास्तों, ऊबड़ – खाबड़ पगडंडियों पर चलते चलते कमर और पैर जवाब दे रहे हैं! आधा घंटा कमर पर Volani क्रीम लगा कर लेटा रहा हूं पर नटवर जी के साथ अभी सुरकंडा देवी दर्शन के लिये निकलना है! हिम्मत तो करनी ही होगी ! एक बार वर्ष 2013 में धनौल्टी आया था तो उस समय भी सुरकंडा देवी दर्शन की बात हुई थी, पर जाना नहीं हो पाया ! इस बार मां के दर्शन करने ही हैं, यह ठान लिया है, वही शक्ति भी देंगी ! यही सोच कर मैं अपनी हट क्रमांक 8 से पांच सीढ़ियां उतर कर नीचे उतर आया हूं! हट क्रमांक 3 के बाहर आकर नटवर लाल भार्गव को आवाज़ दी तो वह भी अपने हट की चेन खींच कर बन्द करते हुए नीचे चल पड़े हैं ! कल मैं चंबा की ओर से आया था सो मेरी कार मसूरी / धनोल्टी की ओर मुंह किये हुए खड़ी है सो हम दोनों कार में बैठ कर अब कद्दूखाल की ओर चल पड़े हैं जहां से सुरकंडा देवी मंदिर के लिये सीढ़ियां चढ़नी होती हैं !

सुरकंडा देवी शक्तिपीठ का भव्य मंदिर : समुद्र तल से ऊंचाई 3021 मीटर !

सुरकंडा देवी शक्तिपीठ

कुछ ऐतिहासिक जानकारी

इतना तो हम सभी जानते ही हैं कि भगवान शिव की पहली पत्नी सती थीं जिन्होंने अपने पिता द्वारा भगवान शिव की अवहेलना और अपमान से क्षुब्ध होकर यज्ञकुंड में ही कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी ! अपनी प्राणों से भी प्रिय पत्नी के मृत शरीर को देख कर शिव जी विक्षिप्त जैसे हो गये और उनके मृत शरीर को उठाये हुए घूमते फिरते रहे और अंततः कैलाश पर्वत जा पहुंचे! पौराणिक कथाओं के अनुसार, खास तौर पर देवी भागवत पुराण के अनुसार जहां – जहां पर भी आकाश से मां सती के शरीर के विभिन्न अंग, वस्त्र और आभूषण गिरे, वह सब स्थान मां के शक्तिपीठ कहलाये ! ऐसे 51 शक्तिपीठ देश में मौजूद हैं! सुरकंडा देवी शक्तिपीठ भी ऐसा ही एक शक्तिपीठ है जहां पर मां सती का सिर गिरा था! यह विश्वेश्वरी दुर्गा सुरकंडा देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है!

सुरकण्डा देवी के लिये चढ़ाई चढ़ते हुए रास्ते में ये सूचना पट्ट दिखाई देता है! यहीं से रोप वे भी आप सब को ऊपर मंदिर तक लेकर जाया करेगी !

कहा जाता है कि यहां पर देवराज इन्द्र ने तपस्या की थी जिसके कारण यह स्थान सुरकुट के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ! यहां ज्येष्ठ मास में गंगा दशहरे पर मेला आयोजित होता है! इसके अलावा नवरात्रों में भी यहां पर बहुत श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं !

भौगोलिक स्थिति

कानाताल से कद्दूखाल की ओर जाते समय रास्ते में यह विशाल मठ भी दिखाई देता है! मुझे लगता है कि समय निकाल कर ये मठ भी देखा जाना चाहिये था!

सुरकंडा देवी शक्तिपीठ उत्तराखंड में जिला टिहरी गढ़वाल में चंबा – धनोल्टी – मसूरी मार्ग पर स्थित है! इस मार्ग पर कद्दूखाल नामक एक ग्राम है जहां से सुरकंडा देवी शक्तिपीठ के लिये पैदल रास्ता शुरु होता है और लगभग 2 किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़ कर मंदिर तक पहुंचते हैं। कद्दूखाल में प्रवेश द्वार से लेकर मंदिर तक लगभग 2 किमी के इस रास्ते में कहीं सीढ़ियां मिलती हैं तो कहीं सड़क बनी हुई है! मंदिर तक पहुंचने का एक पुराना रास्ता भी है जो डेढ़ – दो किमी पहले आरंभ होता है पर उस रास्ते का अब उपयोग न के बराबर ही होता है। इस नये मार्ग पर रोप वे का काम भी बहुत तेज़ी से चल रहा है! रोपवे के आरंभ और अंत में गंडोला के लिये स्टेशन बनाये जा चुके हैं और खंभे भी खड़े कर दिये गये हैं ! आशा की जानी चाहिये कि वर्ष 2021 के अन्त तक रोप वे का संचालन आरंभ हो जायेगा!

रोप वे का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है! न केवल खंभे लगाये जा चुके हैं बल्कि नीचे और ऊपर रोप वे स्टेशन का ढांचा भी खड़ा किया जा चुका है!

समुद्रतल से मंदिर की ऊंचाई 3021 मीटर है और यहां से श्री बद्रीनाथ, श्री केदारनाथ, नंदा देवी, गौरी शंकर पर्वत, चौखंभा व गंगा द्वार, ऋषिकेश, चन्द्रबदनी, चकरौता, देहरादून व हिमालय के सुन्दर दर्शन होते हैं ! सच तो ये है कि मंदिर पर पहुंचते ही सारी थकान पता नहीं कहां गायब हो जाती है और मन प्रफुल्लित हो उठता है!

कद्दूखाल में सड़क किनारे कार खड़ी करके और मन ही मन में मां सुरकण्डा देवी की जयकार करते हुए हमने सीढ़ियां चढ़ना आरंभ किया। मुझे लगा कि ऐसा कुछ काम किया जाये जो पहले किसी ने भी न किया हो ! मैने सीढ़ियां गिननी आरंभ कर दीं पर गणित में स्कूल के दिनों से ही हाथ थोड़ा तंग रहा है, सो 100 के बाद भूल गया! वैसे भी कभी फोटो खींचने लगता था तो कभी नटवर जी से पूछने लगता था कि अभी और कितना ऊपर जाना है! वह बार – बार यही कहते कि बस, थोड़ा सा और ! वो सामने मंदिर दिखाई दे रहा है, वहीं तो जाना है! एक समस्या और भी आई ! सीढ़ियां लगातार हों, ऐसा नहीं है! कभी सीढ़ी तो कभी सपाट सड़क ! १००-२०० कदम चलते रहो, फ़िर अचानक सीढ़ी सामने आ जाती थीं ! मैं जब रास्ते में भारी भरकम लोगों को भी बड़ी तेजी से मंदिर की ओर बढ़ते हुए देखता तो आश्चर्य करता रहा कि मैने ही खुद को इतना कमज़ोर क्यों बना डाला है! नटवर जी तो जवान घोड़े की तरह सरपट भागे चले जा रहे थे और आगे जाकर मेरी इंतज़ार करने लगते थे।

जैसे – तैसे अपनी सांसों पर काबू करते हुए, स्थान – स्थान पर बने हुए शैड में रुकते हुए लगभग १ घंटे में हम ऊपर मंदिर पहुंच गये ! सबसे पहला आश्चर्य तो मेरे लिये ये था कि मंदिर के प्रांगण में कदम रखते ही, मेरी सारी थकान छू मंतर हो गयी! ऐसा आम तौर पर मेरे साथ कभी होता नहीं है पर उस दिन हुआ! इतनी ऊंचाई पर पहुंच कर 360 डिग्री दृश्यावली दिखाई देने लगी थी जिसमें उत्तर की ओर हिमालय पर्वत श्रंखला और दूसरी ओर मसूरी धनौल्टी चकरौता वगैरा थे! आजकल लोगों ने उत्तराखंड के जंगलों में आग लगाई हुई है जिसका धुआं हिमालय के दृश्य को बाधित किये हुए है! हमें न बंदरपूंछ चोटी दिखाई दी, न ही स्वर्गारोहिणी ! अपना सा मुंह लेकर रह गये!

लगभग एक घंटे मंदिर के प्रांगण में घूमते – फिरते रहे, इधर – उधर के नज़ारे लेते रहे और फिर वापिस यात्रा शुरु हुई ! नटवर जी के पास कैंप से फोन आया कि खाने में क्या बनाया जाये ! दाल – चावल – सब्ज़ी – रोटी के लिये बोल दिया और हम खरामा – खरामा नीचे उतर आये! सारे रास्ते हमें नीचे पहाड़ में बने हुए मकान दिखाई देते रहे जिनकी लाल रंग से पुती हुई छतें बहुत आकृष्ट करती हैं ! ऊपर से ही नटवर जी ने अपना कैंप भी दिखाया जहां मैं रुका हुआ हूं !

नीचे आकर हमने एक – एक कप कॉफी पी और कार में बैठ कर वापिस कानाताल की ओर चल दिये! मेरा आज का घुमक्कड़ी का कोटा पूरी तरह से फुल हो चुका था और तनिक भी और चलने की हिम्मत बाकी नहीं थी ! पर मन में इस बात की बहुत खुशी थी कि आज सुरकण्डा देवी के दर्शन कर लिये!

कैंप में आकर खाना खा कर मैं लंबी तान कर सो गया और रात को जब नटवर जी ने डिनर के लिये जगाया तो ही मेरी आंख खुली ! पुनः खाना खाया और फ़िर सो गया! सुबह जल्दी निकलना है, यह तय किये हुए हूं पर कहां जाना है, यह अभी निश्चित नहीं है! नटवर जी ने सुझाव दिया है कि चंबा से टिहरी झील बिल्कुल पास में ही है अतः चंबा तक आकर भी टिहरी झील देखे बिना वापिस जाना कतई उचित नहीं होगा ! ठीक है जी ! ऐसा ही सही ! दूसरी ओर मन में ये भी आ रहा है कि मैं मसूरी रोड पकड़ कर देहरादून – सहारनपुर होते हुए वापिस गुड़गांव के लिये निकल लूं ! मगर इतनी जल्दी वापिस गया तो श्रीमती जी कहेंगी – बस, इतनी जल्दी वापिस आ गये? घुमक्कड़ी का बुखार बड़ी जल्दी उतर गया !!!

चलो खैर, सुबह देखेंगे कि किधर का रुख किया जाये ! आप तो बस, मेरे साथ चलते चलिये ! ऐसे, बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के घुमक्कड़ी मैने आज से पहले कभी नहीं की थी! बहुत अच्छा लग रहा है ! कल को मेरी कार चंबा – टिहरी की ओर घूमेगी या मसूरी – धनोल्टी की ओर, ये सुबह ही देखा जायेगा ! फ़िलहाल नमस्कार !

4 thoughts on “सुरकंडा देवी दर्शन

  1. Rakesh Kumar Kataria

    बहुत ही सुंदर खूबसूरत दृश्य से युक्त आपने ब्लॉग लिखा है। पढ़ कर जनवरी की यादें ताजा हो गई।

    यह स्थल सच में बहुत ही सुंदर है
    चढ़ाई भी कोई ज्यादा लंबी नहीं है
    यह पढ़कर अत्यंत दुख हुआ की जंगल में आग लगने के कारण आप हिमालयन व्यू नहीं देख पाए
    जो कि जनवरी में सभी साथियों ने हिमालयन व्यू का लुत्फ उठाया था
    खैर भविष्य में फिर देखेंगे हो सकता है
    गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2022 फिर बुरा स्कंडा में ही मनाई जाएगी। ?

    1. Sushant K Singhal

      आदरणीय कटारिया जी, सुरकण्डा देवी मंदिर वास्तव में ही बहुत अद्‌भुत है और मंदिर तक की यात्रा इसे और भी विशिष्ट बना देती है! आप सब का साथ मिलता तो ये यात्रा और भी मनमोहक हो सकती थी! चलिये, 2022 की इंतज़ार करते हैं!

      आपका ब्लॉग तक आना, संस्मरण पढ़ना और अपने विचारों से अवगत कराना मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है! कृपया स्नेहभाव यूं ही बनाये रखें !

      सादर,

      सुशान्त सिंहल

    1. Sushant K Singhal Post author

      विकास जी, इस ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। आपके परिवार की इतनी तारीफ सुन चुका हूँ कि सिर्फ आप सब से भेंट के लिए भी आना बनता है! ??? प्रभु जल्द ही ऐसा सुअवसर उपलब्ध कराएं!

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