India Travel Tales

हमारी काश्मीर यात्रा – पहलगाम

  1. सहारनपुर से जम्मू रेल यात्रा के अद्‌भुत अनुभव
  2. जम्मू से श्रीनगर यात्रा – राजमा चावल, पटनीटॉप, सुरंग, टाइटेनिक प्वाइंट
  3. श्रीनगर के स्थानीय आकर्षण – चश्मा शाही, परी महल, निशात बाग, शालीमार बाग
  4. काश्मीर का नगीना डल झील – शिकारे में सैर
  5. गुलमर्ग – विश्व का सबसे ऊंचा गण्डोला और बर्फ़ में स्कीइंग
  6. काश्मीर – पहलगाम यात्रा डायरी और वापसी

मित्रों, गुलमर्ग से वापिस श्रीनगर तक की हमारी यात्रा काफी सनसनीखेज रही। आज हमारा कार्यक्रम पहलगाम का है। श्रीनगर से पहलगाम की दूरी करीब 90 किमी है और ये यात्रा लगभग 3 घंटे में सम्पन्न होती है। हमारा वापिस श्रीनगर आने का कोई कार्यक्रम नहीं था, अतः सुबह होटल से चेक आउट करके अपना सामान प्रीतम प्यारे की कार में लाद कर ब्रेकफ़ास्ट के बाद श्रीनगर को बाय – बाय कह कर हम पहलगाम के लिये निकल पड़े। आज का दिन (और रात्रि भी) पहलगाम के नाम! कल पहलगाम से ही हमारी जम्मू और फिर जम्मू से सहारनपुर की वापसी यात्रा तय है।

पहलगाम के बारे में थोड़ी सी जानकारी

गुलमर्ग की ही भांति पहलगाम भी श्रीनगर की तुलना में काफी ऊंचाई पर स्थित एक छोटा सा हिल स्टेशन है। यदि आप अमरनाथ यात्रा पर गये हैं तो आपको ज्ञात ही होगा कि अमरनाथ गुफ़ा तक पहुंचने के दो रास्ते हैं – एक वाया पहलगाम और चन्दनबाड़ी और दूसरा – वाया सोनमर्ग और बालटाल ! पहलगाम – चन्दनबाड़ी वाला रास्ता लम्बा है किन्तु प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है। लिड्डर नदी के तट पर बसा हुआ पहलगाम अपने सौन्दर्य के लिये या तो लिड्डर नदी पर निर्भर है या फिर नभस्पर्शी हिमाच्छादित पर्वत श्रंखला पर !

पहलगाम की समुद्रतल से औसत ऊंचाई 8990 फ़ीट है जबकि श्रीनगर 5100 फ़ीट ऊंचाई पर ही है। यूं तो पहलगाम की आबादी 6500 से आस पास ही है, पर जब हज़ारों की संख्या में अमरनाथ यात्री यहां और चंदनबाड़ी में कैंप करते हैं तो पहलगाम की आबादी सहसा कई गुना हो जाती है।

पहलगाम की शोभा में लिड्डर नदी चार चांद लगा देती है। लिड्डर नदी का प्राचीन नाम लंबोदरी नदी है और इसकी कुल लंबाई 73 किमी है। ये झेलम नदी की सहायक नदी है और 30 किमी यात्रा करने के बाद ये पहलगाम पहुंचती है। जब हम 19 मार्च को पहलगाम पहुंचे तो इस नदी में पानी न के बराबर ही था और इस कारण हम लिड्डर की झिलमिलाती, जगमगाती पावन जलधारा के दर्शन नहीं कर सके। पहलगाम लिड्डर घाटी के केन्द्र में बसा हुआ एक छोटा सा कस्बा है और प्रतिवर्ष हज़ारों तीर्थयात्रियों का और पर्यटकों का स्वागत करता है।

दो चार होटलों को देखते – परखते हुए और उनके रेट पूछते पूछते हम अन्ततः पाइन पैलेस रिज़ॉर्ट में जा पहुंचे। पहलगाम से चन्दनबाड़ी की ओर बढ़ें तो लिड्डर नदी हमारे बायें हाथ पर होती है और सड़क के दायीं ओर, थोड़ा सा अन्दर को हट कर पाइन पैलेस रिज़ॉर्ट था जहां हमने कमरे देखे, रेट पूछे और बात बन गयी।

पाइन पैलेस रिज़ॉर्ट पहलगाम
कई सारे होटलों की खाक छानने के बाद अन्ततः हमने पाइन पैलेस रिज़ोर्ट में डेरा जमाना तय पाया।
यहां भी ग्राउंड में बर्फ़ जमी हुई थी पर घास और मिट्टी में सनी हुई होने के कारण उसमें कोई रुचि हमें नहीं थी।
यहां रिज़ॉर्ट के ग्राउंड में भी बर्फ़ जमी हुई थी पर घास और मिट्टी में सनी हुई होने के कारण उसमें कोई रुचि हमें नहीं थी।
पाइन पैलेस रिज़ॉर्ट पहलगाम :  कमरे अच्छे बड़े और हवादार थे, जिनमें से बाहर का व्यू सीज़न के दिनों में बहुत आकर्षक लगता होगा।  वॉल टु वॉल कार्पेट के नीचे लकड़ी का फ़र्श था जो हर मौसम में आराम दायक होता है।
पाइन पैलेस रिज़ॉर्ट पहलगाम : कमरे अच्छे बड़े और हवादार थे, जिनमें से बाहर का व्यू सीज़न के दिनों में बहुत आकर्षक लगता होगा। वॉल टु वॉल कार्पेट के नीचे लकड़ी का फ़र्श था जो हर मौसम में आराम दायक होता है।
दोपहर को खाना खाने के लिये प्रीतम प्यारे की सलाह मानते हुए हमने दाना पानी शुद्ध शाकाहारी भोजनालय में भोजन किया और फिर रात को भी और कहीं जाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की।
दोपहर को खाना खाने के लिये प्रीतम प्यारे की सलाह मानते हुए हमने दाना पानी शुद्ध शाकाहारी भोजनालय में भोजन किया और फिर रात को भी और कहीं जाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की।

शाम को हम लिड्डर (लंबोदरी) नदी के ऊपर बने हुए हरे रंग के लोहे के पुल को पार करके उस पार पहुंच गये जहां हमें एक पार्क दिखाई दे रहा था। उस पार्क में प्रवेश के लिये शुल्क निर्धारित था पर न तो वहां कोई टिकट देने वाला था, न ही चेक करने वाला ! जो झूले थे भी, उनको operate करने वाला भी वहां कोई नज़र नहीं आया। स्वाभाविक रूप से हम बिना किसी से अनुमति लिये अन्दर पार्क में घूमते फिरते रहे, झूलों पर बैठ कर फोटो खींचते रहे। (वीडियो तो बनानी थी नहीं जो झूले को घूमते हुए दिखाना जरूरी हो!) बाहर आये तो एक वर्गाकार, खंडहर नुमा ममल मन्दिर दिखाई दिया जो अत्यन्त प्राचीन अनुभव हो रहा था। उस मंदिर में पूजा पाठ चल रहा था, सो हम भी शामिल हो गये। बाहर आये तो लगा कि लिड्डर नदी में ही पत्थरों पर कुछ फोटो खींच ली जायें। जब थक गये तो कार में आ बैठे और दाना पानी में रात्रि भोजन लेकर वापिस अपने होटल पर आ गये। चांदनी रात में बर्फ़ से ढके पहाड़, मैदान एक अद्‍भुत समां बांध रहे थे। दस-पांच फोटो खींच कर मैं भी कमरे में आ गया जहां हम चारों लोग बहुत देर तक गपशप करते रहे। सुबह हमारी जम्मू के लिये वापसी तय थी।

पहलगाम ! चांदनी रात में होटल के कमरे से बाहर का दृश्य
पहलगाम से वापसी : रात भर बारिश होती रही थी ! तेरी सुबह कह रही है तेरी रात का फ़साना !

सुबह जब छः बजे के करीब जब सोकर उठे तो पता चला कि कई घंटों से धुआंधार वर्षा चल रही है। पर जम्मू से हमारी आज रात की ट्रेन थी और जितने घंटे जम्मू से श्रीनगर आने में लगे थे, लगभग उतना ही समय वापसी में भी लगना अपेक्षित था। रास्ते में बारिश तो एक घंटे बाद रुक गयी थी, परन्तु अनन्तनाग मार्ग पर कई जगह पेड़ टूटे हुए मिले। पर हमारी यात्रा में विघ्न नहीं पड़ा क्योंकि गांव वाले पेड़ों को काट – पीट कर अपने घर लेजाने के लिये गठरियां बनाते हुए मिले।

ऐसे में जाम न लगे तो और क्या होगा?
पीर पंजाल पर्वत श्रंखला भी आ गयी जिसे हम जवाहर टनल के सहारे पार करेंगे।
पीर पंजाल पर्वत श्रंखला भी आ गयी जिसे हम जवाहर टनल के सहारे पार करेंगे।
लीजिये, कुद भी आ गया जहां हम पतीसा खरीदने के लिये उतरे पर खरीदा नहीं !
कुद के सरकारी स्कूल के प्यारे प्यारे बच्चे !
लैंड स्लाइड से सड़क को व वाहनों को खतरा न हो, इसके लिये ये स्टील के जाल लटकाये गये हैं। ये जाल पत्थरों को सड़क तक नहीं पहुंचने देते।

हम रास्ते में कुद में रुके, वहां का तथाकथित ’विश्वविख्यात’ पतीसा खाकर देखा और हम चारों इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि कुद वालों को पतीसा बनाना आता ही नहीं है। हमारे सहारनपुर का पतीसा यहां के पतीसे से लाख गुना बेहतर है। कुद के पतीसे के गुण वही लोग गा सकते हैं जिन्होंने सहारनपुर का बना हुआ पतीसा कभी चखा ही न हो। वहीं एक पार्क भी था, हम जाकर वहां कुछ देर बैठे, घूमते रहे। फिर एक खूनी नाला भी आया जहां की चाय बड़ी मशहूर है। एक जगह पहाड़ से पत्थर गिर रहे थे। प्रीतम प्यारे ने गाड़ी उससे पहले ही रोक ली और बीस – पच्चीस मिनट इंतज़ार की । जब पत्थर गिरने बन्द हो गये तो भगवान का नाम लेते हुए गाड़ी वहां से निकाली गयी।

खूनी नाला !
खूनी नाले के पास एक मंदिर
रास्ते में भूख लगी तो एक ढाबे में रुक कर परांठे बनवा लिये !
अगर मौसम ’खराब’ हो तो वह फोटो खींचने के लिये बहुत सही मौसम होता है!
जम्मू के प्लेटफ़ार्म पर अपनी ट्रेन का इंतज़ार ! वेटिंग हॉल में जब जगह न मिले तो प्लेटफ़ार्म ही सही!

जम्मू पहुंचते – पहुंचते शाम हो चुकी थी। थकान भी बहुत थी। अतः और कहीं घूमने जाने का तो प्रश्न ही नहीं था। जाकर प्लेटफार्म पर ही आसन जमा लिया गया और जब ट्रेन आई तो पता चला की हमारी आर.ए.सी. वाली चारों बर्थ कन्फ़र्म हो चुकी हैं। स्वाभाविक रूप से अब मुझे पंकज का एनकाउंटर करने की कोई वज़ह बाकी नहीं रह गयी थी! हम लोग अपनी अपनी बर्थ पर सवार हो गये और कब नींद के आगोश में समा गये, हमें खुद ही नहीं पता। सुबह छः बज कर बीस मिनट पर जब हमारी गाड़ी सहारनपुर के प्लेटफ़ार्म पर आकर रुकी तो हम सब दो रिक्शों में लदे – फदे अपने अपने घर की ओर चल दिये।

तो मितरों ! इस प्रकार हमारी पांच दिन की काश्मीर यात्रा सम्पन्न हुई। आपने इस यात्रा में हमारा जिस स्नेह भाव से साथ दिया उसके लिये मैं हृदय से कृतज्ञ हूं। यदि आप काश्मीर यात्रा का प्लान बना रहे हैं तो मैं आपको जो सलाह दूंगा वह निम्न प्रकार से है –

  • काश्मीर जाने के लिये मार्च का महीना ऑफ सीज़न होने के कारण सस्ता व सुविधाजनक तो अवश्य हो सकता है परन्तु यदि आप प्राकृतिक सौन्दर्य के दर्शन करना चाहते हैं तो मई तक प्रतीक्षा करें। स्वाभाविक रूप से इस समय तक पर्यटकों की भीड़ अवश्य हो जाती है पर मज़ा भी तभी आता है।
  • यदि आपके लिये मुख्य आकर्षण बर्फ़बारी है तो फिर आपको दिसंबर – जनवरी के महीने में जाना चाहिये। इन महीनों में आपको गुलमर्ग – सोनमर्ग में ही नहीं, पूरे काश्मीर में बर्फ़ ही बर्फ़ मिलेगी।
  • जब हम काश्मीर गये थे तो उस समय तक भारतीय रेलवे की सेवा वहां उपलब्ध नहीं थी। अब बारामुला – श्रीनगर – बनिहाल रेल मार्ग पर ट्रेन चलती हैं और सुना है कि ये काश्मीरी पर्यटकों के लिये सबसे बड़ा आकर्षण सिद्ध हो रहा है। आपकी ट्रेन के ऊपर भी बर्फ़ हो, नीचे भी बर्फ़ हो, आगे-पीछे, दायें – बायें बर्फ़ हो, रेलवे ट्रैक पर भी बर्फ़ हो तो आप कल्पना कर सकते हैं कि ये यात्रा कैसी रोमांचकारी होगी! बनिहाल से जम्मू के बीच में भारतीय रेलवे चेनाब नदी के ऊपर एक पुल के रूप में विश्व कीर्तिमान बनाने जा रही है जो दिसंबर 2021 तक पूरा हो जाने की आशा है। यदि आपकी काश्मीर यात्रा से पहले ये पुल बन जाये तो आप को सड़क मार्ग के बजाय रेल मार्ग से काश्मीर जाना चाहिये!
  • हमें काश्मीर में शॉपिंग का अनुभव बहुत खराब रहा। दुकानदारों ने ज्यादातर खराब सामान बेचने की ही कोशिश की, रेट भी ऊटपटांग लगाये। हमने होटल के पास एक एम्पोरियम से लैदर की चार जैकेट खरीदीं और चारों ही खराब निकलीं ! दुकानदार की बातचीत शहद से भी ज्यादा मीठी थी और मेरी पत्नी को बार – बार वह अपनी बेटी जैसा ही घोषित कर रहे थे। इन दाढ़ी वाले सज्जन के अपनत्व भरे व्यवहार से प्रभावित होकर इसी दुकान से श्रीमती जी ने चार – पांच पैकेट केसर के भी खरीद लिये थे। वह और कुछ भी हो, कम से कम केसर तो नहीं ही था। Bouleward Road पर सरकारी हैंडीक्राफ़्ट एम्पोरियम में भी हमें यही लगा कि यहां पर रेट कुछ जरूरत से ज्यादा ही हैं।
  • गुलमर्ग में गंडोला के मजे जरूर लें। यह गंडोला दो स्तरों पर ले कर जाता है। आप सबसे ऊपर वाले स्तर तक न भी जायें तो भी बीच वाले स्तर तक तो जाना ही चाहिये।